General Studies Paper-3: Technology, Economic Development, Biodiversity, Environment, Safety and Disaster Management
(Section 1: Topics related to Indian economy and planning, mobilization of resources, progress, development and employment)

सन्दर्भ

विगत वर्ष के अंत में घटित विमुद्रीकरण की घटना का एक परिणाम यह निकला है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने डिजिटलिकरण की तरफ कदम बढ़ा दिये। डिजिटलिकरण एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण प्रयास है लेकिन इसके साथ ही ज़रूरत एक ऐसे ढाँचे को विकसित करने की भी थी जो डिजिटलिकरण का आधार बन सके, हालाँकि हम ऐसा करने में सफल नहीं रहे हैं। यदि देश को डिजिटल युग में ले जाना है, तो हमें न केवल वैधानिक ढाँचे पर ध्यान देना होगा बल्कि उन उपभोक्ताओं की आशा-अपेक्षाओं का भी समाधान करना होगा जो डिजिटल नकदीरहित अर्थव्यवस्था में बढ़-चढ़करकर शिरकत कर रहे होंगे।

साइबर अपराधों में वृद्धि

  • विदित हो कि एसोचैम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 से वर्ष 2014 के बीच साइबर अपराधों में 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, वहीं इंडियन कंप्यूटर रिसर्च टीम का कहना है कि केवल वर्ष 2015 में 50 हज़ार से ज़्यादा साइबर अपराध हुए हैं। विमुद्रीकरण के साथ ही स्मार्टफोन, लेन-देन का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है, ऐसे में साइबर सुरक्षा पहले से कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण बन गई है। इस बात कि पुष्टि के लिये हम नोकिया द्वारा जारी मालवेयर रिपोर्ट का उदहारण दे सकते हैं जिसके अनुसार 2016 में मोबाइल फोंस के मालवेयर से संक्रमित होने की घटनाओं में 96 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
  • यह चिंतनीय है कि भारत में डिजिटल तथा मोबाइल भुगतान के लिये अलग से कोई कानून नहीं है। इसके चलते इस प्रकार के भुगतानों को लेकर तमाम संशय उभकर सामने आए हैं। भारतीय साइबर कानून में मोबाइल फोन से होने वाले भुगतानों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। बस इतना भर हुआ कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम, 1935 में संशोधन किया गया जिससे आरबीआई को कुछ अधिकार मिल गए ताकि वह इलेक्ट्रॉनिक तंत्र के कुछेक पहलुओं पर गौर कर सके पर इसमें मोबाइल फोन के जरिये भुगतान का कोई वैधानिक ढाँचा नदारद रहा।

क्या हो आगे का रास्ता?

  • भारत सरकार ने 2013 में नेशनल साइबर सिक्यूरिटी पॉलिसी बनाई। लेकिन यह नीति तमाम बातों के बावजूद मात्र कागजी दस्तावेज साबित हुई। हम इस नीति के कारगर क्रियान्वयन में सफल नहीं हो सके। इस नीति के अंतर्गत वर्ष 2013 में कहा गया था कि भारत को हर साल पाँच लाख साइबर सुरक्षा संबंधी पेशेवरों की ज़रूरत होगी। अब यह विचार उभरा है कि भारत को हर साल ऐसे दस लाख पेशेवरों की जरूरत होगी। बहरहाल, इतना स्पष्ट है कि आज के परिदृश्य में भारत को इससे कहीं अधिक पेशेवरों की दरकार होगी।
  • भारत में साइबर अपराध बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि विमुद्रीकरण के बाद साइबर अपराध की घटनाओं में खासी बढ़ोतरी हुई है। साइबर अपराधी श्रृंखला की सबसे मज़बूत कड़ी के बजाय सबसे कमजोर कड़ी को निशाना बनाते हैं। 2008 में किये गए संशोधनों से कुछेक को छोड़कर करीब-करीब सभी साइबर अपराधों को जमानत योग्य बना दिया गया है। इससे अभियोजन की साइबर अपराधों के लिये दंड दिलाने की क्षमता पर सीधे असर पड़ा है। अतः यह ज़रूरी हो गया है कि साइबर अपराधों को मौजूदा कानून के तहत व्यापक आधार दिया जाए ताकि दंड सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष

  • हमारी अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे डिजिटलीकरण के पथ पर कदम बढ़ा रही है ठीक वैसे-वैसे साइबर सुरक्षा का खतरा अब और भी ज़्यादा गंभीर एवं प्रत्‍यक्ष होता जा रहा है। आज आम आदमी को हैंकिंग, स्‍पैमिंग, मालवेयर और डाटा चोरी होने की समस्‍याओं का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि, इसके बावजूद साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूकता काफी कम है। इस दिशा में साइबर सुरक्षा ढाँचे के निर्माण के साथ-साथ आपसी सहयोग की भी आवश्यकता है ताकि भारत के नागरिकों को एक सुदृढ़ एवं सुरक्षित डिजिटल संसार का हिस्सा बनाया जा सके।

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